मुलाकात – डॉ. रवीन्द्र समीर

Short Story

“डॉ. साहब नमस्कार !”

“नमस्कार ! बहुत बरस बाद आए ?”
“वही तो ! बहुत बरस हुए, आपसे मिले हुए। इसलिए मुलाकात करने आँ पहुँचा।”
“अच्छा लगा। इतने दिनों बाद आपको देख पाया। सबकुछ(स्वास्थ्य) ठीकठाक तो है न ?”
“जी आपकी कृपा से अच्छा ही हूँ।”
“देखिए, हमसे मिलने तो सिर्फ मरीज़ आते हैं। मरीज़ों के साथ संगत करते करते स्वस्थ आदमी मिलना तो दुर्लभ हो गया। खैर, आज आप आगए, खुस हूँ आपसे मिलके।”
इस पेशे में मरते मरते बचे लोभ भी उपचार के बाद मिलने नहीं आते। डॉ. शर्मा का चेहरा खिल उठा।
“छोटी उम्र में मेरे बेटे ने खूब तकलीफ दी। जबतब बिमार पड़ता था। आपके पास हफ्ते दर हफ्ते ले आना होता था। बड़े होनेपर, सामर्थ्य के अनुसार शास्त्री तक पढ़ाया है।”
“जी, बहुत अच्छा किया आपने।”
“क्या कहें, डॉ. साहब, दो बरस हो गए हैं शास्त्री हुए। नौकरी न मिलने से फ्रॉस्टेट हो गया है।”
डॉ. शर्मा ने समझाया – “देर सबेर नौकरी तो मिल ही जाएगी। बस प्रयास जारी रखे, हड़बड़ाए नहीं।”
उसने कहा – “डॉ. साहब ! आज मैं आपको एक तकलीफ देने के लिए आया हूँ। ऐसे ही कैसे आता आपके यहाँ ! जरा मेरे बेटेको अपने अस्पताल में या और कहीं, अच्छी सी नौकरी में लगा देंगे। सुरु में आपकी जितनी कमाई हो तो भी कोई बात नहीं, बाद में अच्छी आमदनी कर लेगा।”

नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी

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